इतनी महंगी और चमकदार पोशाक पहनकर भी जब कोई इंसान टूट रहा हो, तो वो मंजर दिल दहला देता है। मैं जिसे चाँद न मिला की कहानी में ये विरोधाभास बहुत गहराई से दिखाया गया है। वो बार-बार बिस्तर की तरफ देखता है, जैसे कोई जवाब ढूंढ रहा हो जो कभी नहीं मिलेगा। उसकी उंगलियों का कांपना और सांसों का रुक-रुकना बताता है कि अंदर कितना शोर मचा है।
पूरे सीन में सबसे डरावनी चीज वो सफेद चादर है जो सब कुछ ढक रही है। मैं जिसे चाँद न मिला में सस्पेंस बनाए रखने का ये तरीका कमाल का है। लड़का कभी खड़ा होता है, कभी बैठता है, कभी इशारा करता है, लेकिन उस बिस्तर से कोई हिलता नहीं। ये अनिश्चितता दर्शक को बांधे रखती है कि आखिर अंदर कौन है और क्या हालत है। क्या वो सच में बेहोश है या कुछ और?
बिना एक शब्द बोले इतना दर्द दिखाना आसान नहीं होता। मैं जिसे चाँद न मिला के इस किरदार ने साबित कर दिया कि आँखें कितनी कुछ बोल सकती हैं। जब वो दीवार की तरफ मुड़ता है और फिर वापस पलटता है, तो लगता है वो अपनी ही छाया से लड़ रहा है। उसकी हर हरकत में एक मजबूरी है, जैसे वो किसी ऐसे इंसान से माफ़ी मांग रहा हो जो सुन नहीं सकता।
अस्पताल का ये कमरा सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि एक गवाह है जो सब कुछ देख रहा है। मैं जिसे चाँद न मिला में सेट डिजाइन इतना रियलिस्टिक है कि लगता है हम वहीं मौजूद हैं। वो पौधे, वो पेंटिंग्स, वो नीली मशीनें - सब कुछ एक कहानी कह रहा है। जब वो लड़का उस नीली मशीन को छूता है, तो लगता है जैसे वो किसी आखिरी उम्मीद को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।
हर बार जब वो बिस्तर के पास जाता है, तो लगता है अब कुछ होगा, अब कुछ बोलेगा। लेकिन मैं जिसे चाँद न मिला में निराशा ही हाथ लगती है। वो बैठता है, उठता है, फिर से खड़ा हो जाता है - ये चक्र चलता रहता है। ऐसा लगता है जैसे वो समय को रोकना चाहता है, ताकि वो पल कभी न आए जब उसे सच का सामना करना पड़े। ये इंतज़ार सबसे ज्यादा तकलीफदेह है।