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गाँव का गौरववां19एपिसोड

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गाँव का गौरव

90 के दशक में, गाँव का लड़का बचपन से होशियार था, लेकिन खुद को मूर्ख बनाकर रखता था। उसने पढ़ाई का मौका अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को दे दिया और खुद घर पर माँ-बाप के सूअर पालने के काम में हाथ बँटाने लगा। उसे जानवर पालने की बहुत अच्छी समझ थी, इसलिए गाँव के लोग उसकी तारीफ करते थे। फिर लड़के ने शहर जाकर अपने बड़े भाई और बहन से मिलने का फैसला किया। उन दोनों ने शहर में अपनी जगह बना ली थी, पर उन्होंने लड़के को नीचा दिखाते हुए कहा कि वह ठीक से काम नहीं करता, बूढ़े माँ-बाप की देखभाल नहीं करता...
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इस एपिसोड की समीक्षा

दादी का त्याग

दादी माँ की आँखों में वो चिंता साफ दिख रही थी जब वो लड़का बोरा उठाकर जा रहा था। १९९० का कैलेंडर दीवार पर लगा था जो उस दौर की कहानी कहता है। गाँव का गौरव में बुजुर्गों के त्याग को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। उनकी मुस्कान में छिपा दर्द किसी से छुपा नहीं। ये दृश्य देखकर मेरी आँखें नम हो गईं। सच्चा प्यार और जिम्मेदारी का ऐसा उदाहरण आजकल कम ही देखने को मिलता है।

दरवाजे के पार

लकड़ी के दरवाजे के पीछे खड़ी नीली पोशाक वाली लड़की का दर्द दिल को छू गया। वो उसे रोकना चाहती थी पर जानती थी कि उसे जाने देना ही सही है। गाँव का गौरव में बिछड़ने का ये सीन बहुत ही दिल दहला देने वाला है। दरारों से झांकती हुई आँखों में आंसू किसी संवाद से ज्यादा बोल रहे थे। ऐसा शुद्ध प्रेम आजकल की फिल्मों में शायद ही कभी देखने को मिलता हो।

बोरे का वजन

उस लड़के के कंधे पर रखे बोरे का वजन सिर्फ ईंटों का नहीं बल्कि जिम्मेदारियों का भी था। वो मेहनत करके अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहता था। गाँव का गौरव में संघर्ष की इस कहानी को बहुत ही असली तरीके से पेश किया गया है। गाँव की मिट्टी और मेहनत की बदबू इस फिल्म में साफ महसूस की जा सकती है। ऐसे किरदार हमें प्रेरणा देते हैं।

खामोश अभिनय

लड़के के चेहरे पर जो कशमकश थी वो शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। वो दादी को छोड़कर भी नहीं जाना चाहता था पर मजबूरी थी। गाँव का गौरव में संवाद कम हैं पर अभिनय बहुत गहरी है। उसकी आँखों में आंसू और ठान ली हुई जिद साफ झलक रही थी। बिना कुछ कहे ही पूरी कहानी समझ आ जाती है। ये कलाकारों की ताकत है।

९० का दशक

रेडियो, पुरानी दीवारें और वो कैलेंडर, सब कुछ ९० के दशक की याद दिलाता है। इस कृति ने मुझे वापस बचपन में ले गया। गाँव का गौरव की पृष्ठभूमि इतनी असली है कि आप खुद को उसी गाँव में पाते हैं। उस समय की सादगी और रिश्तों की गहराई आज के शोर में कहीं खो गई है। इन पुरानी यादों को जीने का मौका मिला।

लड़की का दर्द

फूलों वाली पोशाक पहनी लड़की की खामोशी सबसे ज्यादा शोर मचा रही थी। वो रो भी रही थी पर उसे जाने भी दे रही थी। गाँव का गौरव में महिलाओं की ताकत को चुपचाप सहने में दिखाया गया है। उसकी आँखों से गिरता आंसू उसकी मोहब्बत का सबूत था। ऐसे भावुक दृश्य देखकर दिल भारी हो जाता है। बहुत ही प्रभावशाली किरदार निभाया है।

विदाई का पल

घर से दूर जाना कभी आसान नहीं होता, खासकर जब अपन पीछे छूट रहे हों। वो लड़का बोरा उठाकर चल पड़ा पर उसका दिल वहीं रुका था। गाँव का गौरव में महत्वाकांक्षा की कीमत को बहुत बारीकी से दिखाया गया है। उम्मीद है कि उसकी मेहनत रंग लाएगी और वो वापस आएगा। ये सफर आसान नहीं होगा।

रोशनी और छाया

जब वो दरवाजे से बाहर निकला तो सूरज की रोशनी उस पर पड़ रही थी। ये उम्मीद का संकेत था दुख के बीच भी। गाँव का गौरव की छायांकन बहुत ही शानदार है। हर दृश्य एक तस्वीर की तरह लग रहा था। गाँव का परिवेश और रोशनी का खेल देखने लायक है। दृश्य कथा का बेहतरीन उदाहरण है ये।

अनकहा रहस्य

क्या वो लड़की उसकी बहन है या प्रेमिका? उनके बीच की खामोशी बहुत कुछ कह रही है। दादी माँ सब जानती हैं पर चुप हैं। गाँव का गौरव में कुछ रहस्य बनाए रखे गए हैं जो अगले भाग के लिए उत्सुक बढ़ाते हैं। उनके बीच का अनकहा बंधन बहुत शक्तिशाली लग रहा है। जानने की इच्छा हो रही है कि आगे क्या होगा।

सादगी का रत्न

इस लघु फिल्म ने मुझे बिना किसी शोर के हिला कर रख दिया। न ज्यादा नाटक न ही चिल्लाना, बस गहरी भावनाएं। गाँव का गौरव सादगी का एक बेहतरीन उदाहरण है। ये हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। बोरा, दरवाजा और आंसू, सब कुछ यादगार है। ऐसे रत्न को देखने का मौका नहीं गंवाना चाहिए। बहुत ही प्यारा लगा।