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गाँव का गौरववां58एपिसोड

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गाँव का गौरव

90 के दशक में, गाँव का लड़का बचपन से होशियार था, लेकिन खुद को मूर्ख बनाकर रखता था। उसने पढ़ाई का मौका अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को दे दिया और खुद घर पर माँ-बाप के सूअर पालने के काम में हाथ बँटाने लगा। उसे जानवर पालने की बहुत अच्छी समझ थी, इसलिए गाँव के लोग उसकी तारीफ करते थे। फिर लड़के ने शहर जाकर अपने बड़े भाई और बहन से मिलने का फैसला किया। उन दोनों ने शहर में अपनी जगह बना ली थी, पर उन्होंने लड़के को नीचा दिखाते हुए कहा कि वह ठीक से काम नहीं करता, बूढ़े माँ-बाप की देखभाल नहीं करता...
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इस एपिसोड की समीक्षा

दर्द भरी आँखें

बूढ़े किरदार की आँखों में दर्द साफ़ दिख रहा है। जब वह चिल्लाता है तो लगता है जैसे दिल टूट गया हो। गाँव का गौरव ने ऐसे परिवारिक क्लेश को बहुत खूबसूरती से दिखाया है। पुराने ज़माने की वर्दी और आंगन का माहौल कहानी को गहराई देता है। हर डायलॉग में वजन है और अभिनय लाजवाब है। देखकर मन भारी हो गया।

गुस्से का तूफान

नौजवान लड़के की आँखों में गुस्सा और ठान ली हुई जिद साफ़ झलकती है। गले में तौलिया और पसीने से तर बदन मेहनत की कहानी कहता है। गाँव का गौरव की यह कड़ी दिल को छू लेने वाली है। जब वह तौलिया निचोड़ता है तो लगता है वह अपने गुस्से को भी निचोड़ रहा हो। संघर्ष और जुनून का बेहतरीन संगम है यह दृश्य।

खामोश चीखें

अंतिम संस्कार का दृश्य बहुत भावुक कर देने वाला है। तस्वीर के सामने जलती मोमबत्तियाँ और खामोशी चीख रही है। गाँव का गौरव में दिखाया गया यह दुख हर किसी के दिल को छू लेगा। बूढ़े किरदार का रोना और फिर गुस्से में बदल जाना बहुत ही असली लगता है। परिवार की मजबूरियों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है इसमें।

पैसों का खेल

सिक्कों का गिरना और गुल्लक का टूटना किसी बड़ी मुसीबत की ओर इशारा करता है। गाँव का गौरव की कहानी में पैसों का खेल बहुत अहम लग रहा है। गिनतारा चलाने वाले दृश्य से लगता है हिसाब चुकता करने का वक्त आ गया है। हर छोटी चीज़ का इस्तेमाल कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है। यह नाटक बहुत गहराई से बनाया गया है।

पीढ़ियों का संघर्ष

दोनों किरदारों के बीच की तनातनी देखते ही बनती है। बूढ़ा किरदार उंगली उठाकर कुछ कड़वा सच कह रहा है तो नौजवान चुपचाप सुन रहा है। गाँव का गौरव ने पीढ़ियों के बीच की खाई को बहुत अच्छे से दिखाया है। आंगन की मिट्टी और दीवारें भी इस कहानी का हिस्सा लगती हैं। ऐसा लगता है जैसे हर कोने में कोई राज़ छिपा हो।

असली अभिनय

अभिनय इतना असली है कि लगता है हम वहीं खड़े हैं। बूढ़े किरदार की आँखों से आँसू और गुस्सा एक साथ बह रहा है। गाँव का गौरव में ऐसे दृश्य बहुत कम देखने को मिलते हैं। जब वह मुट्ठी भींचता है तो लगता है अब वह चुप नहीं रहेगा। हर भाव में कहानी छिपी हुई है। यह लघु नाटक बहुत प्रभावशाली है।

तेज़ रफ़्तार कहानी

कहानी की रफ़्तार बहुत तेज़ है लेकिन हर पल का मज़ा आता है। नौजवान का चेहरा पढ़कर लगता है वह कुछ बड़ा फैसला लेने वाला है। गाँव का गौरव की यह कहानी बहुत अनोखी है। पुराने घर का माहौल और कपड़े उस ज़माने को याद दिलाते हैं। देखने वाले को बांधे रखने की ताकत है इस झलक में। बहुत ही शानदार प्रस्तुति है।

परिवार की मजबूरी

पारिवारिक कलह और जिम्मेदारियों का बोझ इस झलक में साफ़ दिखता है। बूढ़े किरदार की हालत देखकर तरस आता है। गाँव का गौरव ने समाज की सच्चाई को बिना लाग लपेट के दिखाया है। जब वह ऊपर देखकर चिल्लाता है तो लगता है वह भगवान से शिकायत कर रहा हो। हर डायलॉग दिल पर असर करता है। यह झलक बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है।

इरादों की मज़बूती

तौलिया और गंदी कमीज़ में भी नौजवान नायक लग रहा है। उसकी आँखों में साफ़गी और इरादे की मज़बूती है। गाँव का गौरव में किरदारों की पोशाक भी कहानी कहती है। जब वह बूढ़े किरदार की बात सुनता है तो लगता है वह सब जानता है। धैर्य और गुस्से के बीच का संघर्ष बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। यह कलाकारों की मेहनत का नतीजा है।

आगे की कहानी

यह झलक देखकर लगता है कि कहानी अभी बहुत आगे जाने वाली है। अंत में बूढ़े किरदार का इशारा किसी चेतावनी से कम नहीं है। गाँव का गौरव का हर भाग उत्सुकता बढ़ाता है। मिट्टी की सोंधी खुशबू भी इस झलक में महसूस की जा सकती है। इतने कम समय में इतना बड़ा असर डालना आसान नहीं है। यह नाटक जरूर देखना चाहिए।