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गाँव का गौरववां57एपिसोड

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गाँव का गौरव

90 के दशक में, गाँव का लड़का बचपन से होशियार था, लेकिन खुद को मूर्ख बनाकर रखता था। उसने पढ़ाई का मौका अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को दे दिया और खुद घर पर माँ-बाप के सूअर पालने के काम में हाथ बँटाने लगा। उसे जानवर पालने की बहुत अच्छी समझ थी, इसलिए गाँव के लोग उसकी तारीफ करते थे। फिर लड़के ने शहर जाकर अपने बड़े भाई और बहन से मिलने का फैसला किया। उन दोनों ने शहर में अपनी जगह बना ली थी, पर उन्होंने लड़के को नीचा दिखाते हुए कहा कि वह ठीक से काम नहीं करता, बूढ़े माँ-बाप की देखभाल नहीं करता...
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इस एपिसोड की समीक्षा

माँ का दर्द दिल को छू गया

इस प्रकरण में माँ की आँखों में जो वेदना थी, वो देखकर रूह काँप गई। जब वो जमीन पर गिर गई, तो लगा जैसे सब कुछ टूट गया हो। गाँव का गौरव श्रृंखला में ऐसे भावनात्मक दृश्य बहुत कम देखने को मिलते हैं। अभिनय इतनी असली लगती है कि आप भी उस दर्द को महसूस करने लगते हैं। बेटे का चुप रहना और पिता का गुस्सा दोनों ही कहानी को आगे बढ़ा रहे हैं। नेटशॉर्ट अनुप्रयोग पर यह नाटक देखना एक अलग ही अनुभव है।

पिता का गुस्सा क्यों है इतना भयानक

नीली पोशाक वाले पिता का गुस्सा देखकर डर लग रहा था। उनकी आँखों में क्रोध और उंगली का इशारा सब कुछ बता रहा था। गाँव का गौरव में पात्रों के बीच की दूरी साफ झलकती है। क्यों वो बेटे पर चिल्ला रहे हैं? क्या कोई बड़ा राज छिपा है? हर संवाद में वजन है और हर चेहरे के भाव कहानी कहते हैं। ऐसे दृश्य बार-बार देखने का मन करता है। रहस्य बना हुआ है।

बेटे की चुप्पी में है सबसे बड़ा राज

जवान लड़के के गले में तौलिया और चेहरे पर शांति देखकर हैरानी हुई। जब घर में इतना शोर हो रहा था, तो वो क्यों चुप था? गाँव का गौरव की कहानी में यह पात्र सबसे ज्यादा रहस्यमयी लग रहा है। शायद वो सब जानता है लेकिन बोल नहीं रहा। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी जो संघर्ष की कहानी सुना रही थी। नेटशॉर्ट पर ऐसे पात्र मिलना मुश्किल है। बहुत गजब का अभिनय है।

गाँव की मिट्टी और कहानी की खुशबू

इस श्रृंखला का परिवेश बहुत ही असली लगता है। ईंटों वाले घर और आंगन का नज़ारा मन को सुकून देता है, भले ही कहानी में शोर हो। गाँव का गौरव ने ग्रामीण जीवन की सच्चाई को बहुत खूबसूरती से दिखाया है। पात्रों के कपड़े और बात करने का तरीका बिल्कुल वैसे ही है जैसे हमारे गाँव में होता है। यह देखकर अच्छा लगता है कि अपनी संस्कृति को पर्दे पर जगह मिल रही है। नेटशॉर्ट अनुप्रयोग का चुनाव सही है।

परिवार के झगड़े की असली तस्वीर

जब घर के तीन सदस्य आमने-सामने होते हैं, तो माहौल कितना तनावपूर्ण हो जाता है, यह दृश्य उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गाँव का गौरव में दिखाया गया यह संघर्ष हर भारतीय परिवार की कहानी लगती है। माँ की बेबसी, पिता का अधिकार और बेटे की मजबूरी सब कुछ बहुत प्रासंगिक है। निर्देशन इतना तेज है कि आप सांस भी नहीं ले पाते। हर दृश्य में एक नया मोड़ है। बहुत पसंद आया।

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