सफेद कमीज वाले के चेहरे पर हैरानी देखकर रोंगटे खड़े हो गए। शुरू में इतना घमंड था फिर एक पल में सब बदल गया। गाँव का गौरव में ऐसे मोड़ बार बार दिल दहला देते हैं। खून बहते हुए भी उसकी आँखों में जिद्द साफ दिख रही थी। यह दृश्य बहुत ही तीव्र भावनाओं से भरा हुआ है। दर्शक के रूप में मैं बस देखता रह गया कि कैसे परिस्थितियाँ पलट गईं। सच्ची ताकत शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक होती है जो यहाँ साबित हुआ।
ग्रे शर्ट वाले की शांति मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई। जब सब चिल्ला रहे थे तब भी वह स्थिर खड़ा रहा। गाँव का गौरव की कहानी में ऐसे पात्र ही असली नायक लगते हैं। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं बल्कि एक ठंडा गुस्सा था जो खतरनाक है। बिना कुछ बोले ही उसने सबको सबक सिखा दिया। संवाद कम थे पर अभिनय बहुत भारी था। ऐसे किरदार निभाना आसान नहीं होता। बहुत ही शानदार प्रदर्शन था इस भाग में।
लाल पोशाक वाली की हालत देखकर बहुत बुरा लगा। वह जमीन पर गिर गई थी पर उसकी आँखों में डर नहीं आश्चर्य था। गाँव का गौरव में महिला किरदारों को भी बहुत मजबूती से दिखाया गया है। वह चुपचाप सब देख रही थी जैसे कुछ बड़ा होने वाला हो। उसके हावभाव बता रहे थे कि वह इस हिंसा की उम्मीद नहीं कर रही थी। कैमरा जब उसके चेहरे पर पास हुआ तो सच्चाई सामने आ गई। बहुत ही संवेदनशील दृश्य था यह।
कार्रवाई वाला सीन बहुत ही वास्तविक लगा। जब लात मारी गई तो सफेद कमीज वाला हवा में उड़ गया। गाँव का गौरव में करतब को ऐसे दिखाया गया है जो बिल्कुल असली लगता है। कुर्सी टूटने की आवाज से ही धक्का लगा। जमीन पर गिरने के बाद भी वह उठने की कोशिश कर रहा था। यह जिद्द ही उसकी कमजोरी बन गई। दर्शकों के लिए यह दृश्य किसी झटके से कम नहीं था। संपादन भी बहुत तेज रफ्तार की थी।
पीछे लगी तस्वीर और मोमबत्तियों ने माहौल को गंभीर बना दिया। यह किसी अंतिम संस्कार या श्रद्धांजलि जैसा स्थान लग रहा था। गाँव का गौरव में मंच सजावट पर बहुत ध्यान दिया गया है। इतने पवित्र स्थान पर यह हिंसा और भी भयानक लग रही थी। सफेद कपड़े और फूलों के बीच खून के निशान बहुत चुभ रहे थे। यह विरोधाभास कहानी को गहराई देता है। मुझे यह पुराने घर का वातावरण बहुत भाया।