योद्धा का बदला के इस दृश्य में मंच पर खड़े दो योद्धाओं के बीच की चुप्पी सबसे ज्यादा डरावनी लग रही है। नीली पोशाक वाला व्यक्ति इतना शांत कैसे रह सकता है जब सामने वाले की आँखों में इतना गुस्सा साफ दिख रहा हो? यह मनोवैज्ञानिक युद्ध किसी भी शारीरिक लड़ाई से ज्यादा तीव्र लग रहा है। दर्शकों की सांसें थमी हुई हैं और हवा में तनाव को महसूस किया जा सकता है।
अंत में उस बुजुर्ग व्यक्ति की जोरदार हंसी ने सबका ध्यान खींच लिया। क्या यह हंसी जीत की है या फिर किसी बड़ी साजिश का संकेत? योद्धा का बदला की कहानी में यह मोड़ बहुत ही रोचक है। उसकी आँखों में चमक और चेहरे के भाव बता रहे हैं कि वह खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। यह पात्र अपनी चुप्पी तोड़कर सबको चौंका देता है।
पीछे खड़ी भीड़ के चेहरे पर साफ डर और चिंता दिख रही है। जब तलवार निकाली जाती है तो सबकी हालत खराब हो जाती है। योद्धा का बदला में भीड़ का रिएक्शन बिल्कुल असली लगता है। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर रहा और सब बस तमाशबीन बने हुए हैं। यह दिखाता है कि उस समय का माहौल कितना खतरनाक था और लोग किस तरह दबे हुए थे।
नीली पोशाक पहने इस युवक का चेहरा पत्थर जैसा सख्त है। न डर, न घबराहट, बस एक अजीब सी शांति। योद्धा का बदला में इस किरदार की चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही है। वह जानता है कि उसे क्या करना है और वह बिना हिले-डुले अपने लक्ष्य पर केंद्रित है। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक है जो बताती है कि वह कोई साधारण योद्धा नहीं है।
जब तलवार गले पर रखी जाती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। योद्धा का बदला का यह दृश्य बहुत ही तीव्र है। वह युवक जो चिल्ला रहा था, अब मौत के मुंह में खड़ा है। चाकू की धार और हमलावर का गुस्सा साफ दिख रहा है। यह हिंसा का वह रूप है जो किसी को भी सहमा सकता है। बचाव का कोई रास्ता नहीं बचा है और सब कुछ एक पल में बदल सकता है।