यह दृश्य देखकर हैरानी हुई कि कैसे एक साधारण लॉलीपॉप पकड़े युवक की मासूमियत और अचानक आए खतरे के बीच का तनाव इतना खूबसूरती से दिखाया गया है। योद्धा का बदला में ऐसे मोड़ आते हैं जो दर्शक को बांधे रखते हैं। सफेद पोशाक वाली नायिका की चिंतित आंखें सब कुछ कह जाती हैं।
जब वह घायल युवक छाती पकड़कर गिरता है, तो पूरे हॉल में एक अजीब सी खामोशी छा जाती है। यह सस्पेंस योद्धा का बदला की खासियत है। पीछे खड़े लोग और दीवारों पर लगे झंडे इस गंभीर माहौल को और भी बढ़ा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा फैसला होने वाला हो।
उस व्यक्ति का प्रवेश जो सफेद कुर्ता पहने है और पीछे से उसकी फौज आ रही है, बिल्कुल एक क्लासिक विलेन एंट्री लगती है। योद्धा का बदला में पात्रों का डिजाइन बहुत दमदार है। उसकी चाल में जो अहंकार है, वह साफ झलक रहा है। अब देखना है कि नायिका कैसे पलटवार करती है।
जिन लोगों के पीठ पर 'बीमार' लिखे तख्ते लटके हैं और वे घुटनों के बल बैठे हैं, उनका दर्द साफ दिख रहा है। योद्धा का बदला सामाजिक न्याय के मुद्दों को भी छूता है। यह दृश्य दिल को झकझोर देता है। नायिका का गुस्सा अब जायज लग रहा है, वह इन बेगुनाहों के लिए लड़ेगी।
सफेद साड़ी में लिपटी इस नायिका के चेहरे पर जो दृढ़ संकल्प है, वह काबिले तारीफ है। योद्धा का बदला में महिला पात्रों को कमजोर नहीं दिखाया गया है। वह डरी हुई नहीं, बल्कि गुस्से में और तैयार लग रही है। उसकी आंखों में आंसू हैं पर हार मानने का इरादा नहीं।