वह शांत बैठा था, लेकिन उसकी आंखों में था तूफान। अब देर हो गई थी, जब वह उठा और कोट बटन करने लगा — जैसे तैयार हो रहा हो किसी बड़े टकराव के लिए। उसका हर movement था जानबूझकर।
उसने कागज पढ़ते ही चीख मारी — ऐसा लगा जैसे कोई बड़ा राज खुल गया हो। अब देर हो गई थी, उसकी आवाज में था गुस्सा और झटका। शायद वह जानती थी कि यह कागज सब कुछ बदल देगा।
मंच पर सजे फूल खिले थे, लेकिन माहौल था तनाव से भरा। अब देर हो गई थी, वह लड़की बस खड़ी रही, जैसे इंतजार कर रही हो कि कब कोई बोले। उसकी चुप्पी थी सबसे जोरदार संवाद।
उसने हाथ मुंह पर रखा, आंखें फैली हुईं — जैसे कोई बुरा सपना देख रही हो। अब देर हो गई थी, उसकी दुनिया हिल गई थी। शायद वह कागज में कुछ ऐसा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था।
वह धीरे से उठा, कोट ठीक की, और सीधे आगे बढ़ा। अब देर हो गई थी, उसकी चाल में था वजन। शायद वह था वह इंसान जो सब कुछ सुलझाने आया था — या शायद और बिगाड़ने।