वह नीले सूट वाला आदमी बिना कुछ बोले सब कुछ कह जाता है। उसकी आंखों में डर नहीं, गणना है। जब वह टैबलेट पर लड़की की तस्वीर देखता है, तो लगता है जैसे कोई राज खुलने वाला हो। अब देर हो गई की कहानी सिर्फ चोट की नहीं, फैसलों की भी है। हर नजर एक सवाल है।
टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही है, पर कमरे में खामोशी चीख रही है। वह लड़की मास्क और चश्मे में छिपी है, पर उसकी मौजूदगी हर पल महसूस होती है। अब देर हो गई का टाइटल सिर्फ ड्रामा नहीं, वक्त की सच्चाई है। जब दुनिया देख रही हो, तो हर सांस एक स्टेटमेंट बन जाती है।
उसने कमीज उतारी, तो सिर्फ मांसपेशियां नहीं, उसका संघर्ष भी नंगा हो गया। बर्फ में बैठते वक्त उसकी सांसें रुकीं, पर हिम्मत नहीं। अब देर हो गई की कहानी में हर एक्शन एक डायलॉग है। वह टॉवल से पसीना पोंछता है, पर आंखों से आंसू नहीं रोक पाता।
वह डॉक्टर सफेद कोट में है, पर उसकी आवाज में दवा नहीं, दहशत है। जब वह हाथ हिलाकर समझाता है, तो लगता है जैसे वह खुद डरा हुआ हो। अब देर हो गई के हर सीन में इलाज नहीं, इमोशनल ट्रामा है। उसकी आंखें कहती हैं — कुछ घाव दवा से नहीं, वक्त से भरते हैं।
जब वह आदमी टैबलेट स्क्रीन घुमाता है, तो लगता है जैसे कोई बम फटने वाला हो। उस लड़की की तस्वीर सिर्फ एक इमेज नहीं, एक टर्निंग पॉइंट है। अब देर हो गई की कहानी में टेक्नोलॉजी नहीं, इंसानियत बोलती है। हर पिक्सेल में एक सवाल छिपा है — क्या वह सच बताएगी?