जब राजा ने नक्शे पर उंगली रखी, तो उनकी आँखों में एक अजीब सा डर था। शायद वो जानते थे कि आगे क्या होने वाला है। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे पल बहुत हैं जहाँ चुप्पी सबसे ज्यादा बोलती है। रानी का चेहरा भी बता रहा था कि वो कुछ छुपा रही हैं।
आँख पर पट्टी बांधे योद्धा का गुस्सा देखकर लगता है जैसे वो किसी से बदला लेने वाला हो। उसकी आवाज़ में इतनी ताकत थी कि कमरे की हवा भी थम गई लगती है। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे किरदार ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। उसकी बांहों पर चोट के निशान भी उसकी लड़ाई की कहानी कह रहे थे।
रानी ने जब नक्शे पर हाथ रखा, तो ऐसा लगा जैसे वो किसी जादू को छू रही हों। उनकी आँखों में एक चमक थी जो बता रही थी कि वो कुछ बड़ा प्लान कर रही हैं। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे पल बहुत हैं जहाँ एक इशारा पूरी कहानी बदल देता है। उनका हर एक्सप्रेशन एक पहेली था।
जब युवक ने घुटने टेके, तो उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा साहस था। शायद वो जानता था कि उसे क्या करना है। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे किरदार ही कहानी में जान डालते हैं। उसकी पोशाक और सिर पर ताज बता रहे थे कि वो कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।
कवच पहने योद्धा महिला की आँखों में एक अलग ही चमक थी। वो सिर्फ खड़ी नहीं थी, बल्कि पूरे कमरे पर नजर रखे हुए थी। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे किरदार दिखाते हैं कि ताकत सिर्फ पुरुषों में नहीं होती। उसकी चोटी और कवच दोनों ही उसकी पहचान थे।
नक्शा सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं था, बल्कि एक बड़े राज की चाबी था। जब रानी ने उसे छुआ, तो ऐसा लगा जैसे वो किसी जादू को जगा रही हों। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे प्रॉप्स कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। उस पर लिखे शब्द और निशान सब कुछ बता रहे थे।
राजा और रानी के बीच की चुप्पी सबसे ज्यादा बोल रही थी। उनकी आँखें एक दूसरे से बात कर रही थीं। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे पल बहुत हैं जहाँ शब्दों की जरूरत नहीं होती। उनका हर इशारा एक बड़े प्लान का हिस्सा लग रहा था।
जब रानी ने ताबीज उठाया, तो ऐसा लगा जैसे वो किसी देवी का आशीर्वाद ले रही हों। उस ताबीज पर बने निशान बहुत पुराने लग रहे थे। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे ऑब्जेक्ट्स कहानी में जादू भर देते हैं। रानी का चेहरा बता रहा था कि वो कुछ बड़ा करने वाली हैं।
पूरा कमरा मोमबत्तियों की रोशनी में जगमगा रहा था, लेकिन हवा में एक अजीब सा तनाव था। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे सेट्स देखकर लगता है जैसे वो असली राजमहल हों। दीवारों पर बने सूरज के निशान भी कहानी का हिस्सा लग रहे थे।
जब रानी ने ताबीज ऊपर उठाया, तो ऐसा लगा जैसे कहानी का अंत होने वाला हो। लेकिन असल में तो बस शुरुआत हुई थी। सत्तर साल पहले की दासी देवी में ऐसे क्लिफहैंगर्स देखकर मन करता है कि बस देखते रहो। हर किरदार की आँखों में एक नई कहानी थी।
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