सभी काले कपड़े पहने हैं लेकिन चेहरे पर दुख नहीं, बल्कि नाटक दिख रहा है। बिना पते की माफ़ी में यह दृश्य दिखाता है कि कैसे लोग मौत का फायदा उठाते हैं। महिला का गुस्सा और पुरुष का डर साफ दिखाई दे रहा है। यह कोई शोक सभा नहीं, बल्कि झगड़े का मैदान है।
छोटी बच्ची को बीच में लाकर नाटक करना कितना गलत है। बिना पते की माफ़ी में यह दृश्य दिखाता है कि कैसे बड़ों के झगड़ों में बच्चों का इस्तेमाल होता है। बच्ची का चेहरा देखकर लगता है कि वह सब समझ रही है लेकिन कुछ कह नहीं सकती। यह बहुत दुखद है।
पुरुष के आंसू देखकर लगता है कि वह सच में रो रहा है, लेकिन महिला का गुस्सा बताता है कि यह सब झूठ है। बिना पते की माफ़ी में यह दृश्य दिखाता है कि कैसे लोग अपने फायदे के लिए नाटक करते हैं। असली दुख में लोग ऐसे नहीं नाचते।
महिला का गुस्सा देखकर लगता है कि वह कुछ छिपा रही है। बिना पते की माफ़ी में यह दृश्य दिखाता है कि कैसे गुस्सा सच्चाई को छिपाता है। पुरुष का डर और महिला का गुस्सा एक दूसरे के विपरीत है। यह झगड़ा कहीं गहरा है।
यह दृश्य किसी नाटक का मंच लग रहा है। बिना पते की माफ़ी में सभी किरदार अपने-अपने रोल निभा रहे हैं। पुरुष का रोना, महिला का गुस्सा, बच्ची का डर - सब कुछ बहुत ज्यादा नाटकीय है। असली जिंदगी में लोग ऐसे नहीं नाचते।