जब हॉल हरमन ने अपनी जेब से हाथ निकालकर टाई ठीक की, तो लगा जैसे वह किसी नाटक का हीरो हो। लेकिन बुज़ुर्गों पर अत्याचार वाले इस दृश्य में उसकी मुस्कान बिल्कुल फर्जी लग रही थी। वह जानता था कि वह गलत है, फिर भी वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था। ऐसे पात्रों से नफरत होती है, लेकिन अभिनय की दाद देनी पड़ती है।
जिम बैक्सटर का एंट्री लेते ही माहौल बदल गया। उसने जिस तरह से उस महिला का हाथ पकड़ा, उससे साफ था कि वह सिर्फ एक स्थानीय व्यापारी नहीं, बल्कि इंसानियत का मसीहा है। बुज़ुर्गों पर अत्याचार के इस माहौल में उसकी उपस्थिति एक उम्मीद की किरण थी। काश हर मुसीबत में ऐसा कोई जिम बैक्सटर मिल जाए जो सही वक्त पर सामने आ जाए।
शुरुआत में लगा कि यह महिला सच में आत्महत्या कर लेगी, लेकिन जब उसने लाइटर जलाया और फिर बुझाया, तो समझ आया कि यह सब ध्यान खींचने का नाटक है। बुज़ुर्गों पर अत्याचार जैसे गंभीर मुद्दे को ऐसे ड्रामेबाजी के साथ दिखाना सही नहीं लगा। हॉल हरमन की बेरुखी और इस महिला का नाटक, दोनों ही अतिरंजित लग रहे थे।
वह महिला जो पूरी तरह काले सूट में थी, उसने एक शब्द नहीं बोला, लेकिन उसकी आंखें सब कुछ कह रही थीं। जब हॉल हरमन अपनी बातें कर रहा था, तो उसकी नजरों में एक अजीब सी बेचैनी थी। बुज़ुर्गों पर अत्याचार के इस खेल में वह भी शामिल थी, लेकिन शायद उसका विवेक जाग रहा था। ऐसे किरदार जो कुछ नहीं बोलते, वही सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं।
कांच की दीवारों वाला यह आलीशान लॉबी अब एक युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। एक तरफ हॉल हरमन और उसके गुंडे, दूसरी तरफ एक अकेली महिला जो न्याय मांग रही थी। बुज़ुर्गों पर अत्याचार की यह कहानी सिर्फ एक कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जो कमजोरों को कुचल देती है। दृश्य बहुत तनावपूर्ण था।