जब पीले वस्त्रों वाला पात्र रो रहा था, तो दिल पिघल गया। ऐसे लग रहा था जैसे सालों बाद मिले हों। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में ऐसे दृश्य बहुत कम देखने को मिलते हैं। काले वस्त्रों वाले का समर्थन देखकर लगा कि शक्ति के बावजूद इंसानियत बाकी है। चित्रण की बारीकियां कमाल की हैं। भावनाओं को बहुत गहराई से दिखाया गया है इसमें।
खोपड़ियों से घिरा सिंहासन देखकर रोंगटे खड़े हो गए। मुखौटा पहने हुए नेता की चुप्पी में एक अलग ही खौफ था। जब वह खड़ा हुआ, तो लगा कि अब असली खेल शुरू होगा। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा की कहानी में यह मोड़ सबसे ज्यादा चौंकाने वाला था। अंधेरे वातावरण का प्रयोग बहुत प्रभावशाली है। रहस्य बना हुआ है।
बैंगनी आंखों वाले पात्र की नफरत साफ झलक रही थी। उसके चेहरे के निशान बता रहे हैं कि उसने बहुत संघर्ष किया है। जब उसने गुस्से में मुट्ठी भींची, तो लगा कि वह बदला लेने वाला है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में ऐसे खलनायक ही कहानी को आगे बढ़ाते हैं। उसकी शक्तियां देखकर डर लग रहा था। चेहरे के भाव भयानक थे।
बुजुर्गों की बैठक में जो चुप्पी थी, वह शोर से ज्यादा डरावनी थी। सब एक दूसरे को शक की नजर से देख रहे थे। राजनीति और धोखे का यह खेल बहुत गहरा है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में दिखाया गया यह संघर्ष वास्तविक लगता है। हर किसी के चेहरे पर छिपा हुआ राज साफ दिख रहा था। तनाव बहुत ज्यादा था।
जंगल के रास्ते तेजी से घोड़ा दौड़ाना किसी तूफान के आने का संकेत था। धूल उड़ रही थी और पेड़ हिल रहे थे। ऐसा लगा कि कोई बहुत जरूरी संदेश लेकर आ रहा है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में एक्शन दृश्यों की रफ्तार बहुत तेज है। यह दृश्य कहानी की गति को बढ़ाता है और दर्शकों को बांधे रखता है। सवारी का नजारा अच्छा था।
जब दोनों पात्रों ने एक दूसरे को गले लगाया, तो आंखें नम हो गईं। यह सिर्फ मिलना नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक था। पीले वस्त्रों वाले की राहत साफ दिख रही थी। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में ऐसे रिश्ते ही कहानी की जान हैं। बिना संवाद के ही सब कुछ कह दिया गया इस दृश्य में। भावनाएं साफ झलक रही थीं।
काले वस्त्रों वाले पात्र की चाल में एक अलग ही अधिकार था। जब वह सिंहासन से उठा, तो हवा में बदलाव आ गया। उसकी आंखों में चमक बता रही थी कि वह सब कुछ जानता है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में इस किरदार का प्रभाव बहुत गहरा है। उसकी उपस्थिति ही दूसरों को डरा रही थी। ताकत का अहसास हुआ।
बैंगनी रोशनी वाली गुफा देखकर लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गए हों। हड्डियां और अजीब आकृतियां माहौल को भयानक बना रही थीं। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा का यह मंच सजावट बहुत ही अनोखा है। यहां होने वाली लड़ाई का अंदाजा लगाया जा सकता है। रंगों का प्रयोग बहुत खूबसूरत है। दृश्य बहुत गहरा था।
जब एक पात्र ने दूसरे के सामने सिर झुकाया, तो समझ गया कि शक्ति किसके पास है। यह सम्मान या डर, कुछ भी हो सकता है। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा में पद के अंतर को बहुत बारीकी से दिखाया गया है। इस छोटे से इशारे ने बड़ी ताकत का संदेश दे दिया। पात्रों के बीच की दूरी साफ झलकती है। अधिकार की बात थी।
अब तक जो हुआ है, उससे लगता है कि बड़ा युद्ध होने वाला है। सभी पात्र अपनी जगह तैयार हो रहे हैं। बेवकूफ बना रहा, मुखिया बन के लौटा का अगला कड़ी देखने का इंतजार नहीं हो रहा है। हर दृश्य में नया रहस्य खुलता है। चित्रण की गुणवत्ता और कहानी का गहराई से जुड़ना कमाल का है। कहानी बहुत रोचक है।