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रणभूमि की रानी

अराजक गणराज्य काल में चन्द्रावती संघ की प्रमुख बबिता राठौड़ विश्वासघात का शिकार होकर भी साहस से उभरती है। राघव मेहता और सोनल चौहान की साज़िशों का सामना करते हुए वह अपने पिता वीरेंद्र सिंह राठौड़ से मिलती है। विक्रम राठौड़ और शत्रु शक्तियों के षड्यंत्रों का पर्दाफाश कर, वह राजेश्वरी देवी के साथ मिलकर चन्द्रावती संघ को पुनर्जीवित करती है और अंततः सेनापति बनकर राष्ट्र की रक्षा करती है।
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इस एपिसोड की समीक्षा

शादी में तनाव

शादी के मंडप में अचानक आया तनाव देखकर रोंगटे खड़े हो गए। उस अधिकारी के चेहरे पर जो दर्द था, वह शब्दों से कहीं ज्यादा गहरा था। लाल लालटेनों के बीच यह काला सच कैसे छिपा था? रणभूमि की रानी ने ऐसे मोड़ की उम्मीद नहीं थी। हर पल संदेह बढ़ता गया। अभिनेता की आंखों में पूरी कहानी थी। जो लोग ड्रामा पसंद करते हैं उनके लिए यह श्रेष्ठ है। देखने के बाद मन बहुत भारी हो गया।

बच्चों का डर

बच्चों के हाथ में बंदूक देखकर बहुत चौंक गई। यह फ्लैशबैक कहानी को नया आयाम देता है। छोटी उम्र में ही युद्ध का सामना करना कितना कठिन होगा। रणभूमि की रानी की पटकथा बहुत मजबूत है। पुराने जमाने के कपड़े और सेटिंग बिल्कुल असली लगती है। देखने वाला हर पल बंधा रहता है। मासूमियत और हिंसा का यह मिश्रण दिल दहला देता है। बच्चों की आंखों में डर साफ था।

बुजुर्ग का रौब

टोपी वाले बुजुर्ग का गुस्सा देखने लायक था। उनकी उंगली का इशारा किसी आदेश से कम नहीं था। सत्ता और ताकत का खेल साफ दिख रहा था। बीच में तलवारबाजी ने माहौल गरम कर दिया। नेटशॉर्ट ऐप पर ऐसे ड्रामा कम ही मिलते हैं। कलाकारों ने जान डाल दी है। हर संवाद में वजन था। यह वीडियो मुझे बहुत पसंद आया। रणभूमि की रानी का स्तर बहुत ऊंचा है।

महिला की चुप्पी

उस महिला की चिंता साफ झलक रही थी। मोती की माला और साड़ी में वह बहुत खूबसूरत लग रही थीं, पर आंखों में डर था। जब सब घुटनों पर थे, तब वह खड़ी थी। रणभूमि की रानी में महिला किरदारों को भी अच्छे से लिखा गया है। भावनाओं का यह खेल दिल को छू गया। उनकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही थी। कपड़ों की सजावट बहुत निखरी हुई थी।

निशान वाला योद्धा

चेहरे पर निशान वाला सिपाही हीरो लग रहा था। उसकी दहाड़ में दर्द और गुस्सा दोनों था। जब वह चिल्लाया तो लगा सब थम गया। एक्शन सीन बहुत तेज थे। तलवार निकलते ही धड़कनें बढ़ गईं। ऐसे रोमांचक दृश्य बार-बार देखने को मिलें। रणभूमि की रानी का यह अंदाज बहुत पसंद आया। एक्शन और इमोशन का सही संतुलन है। आवाज का असर गहरा था।

लाल और काला

लाल रंग की सजावट और गंभीर चेहरे का विरोधाभास अद्भुत था। खुशी के मौके पर गम क्यों है? यह सवाल पूरे वीडियो में बना रहा। रणभूमि की रानी की कहानी में गहराई है। सिर्फ दिखावा नहीं, असली जज्बात हैं। सेट डिजाइन बहुत प्रशंसनीय है। रंगों का उपयोग कहानी को बताने में मदद करता है। यह कलाकारी देखने लायक है। हर फ्रेम सुंदर था।

घुटनों की मजबूरी

घुटनों पर बैठे लोगों की मजबूरी साफ दिख रही थी। वर्दी वाले अधिकारी का रौब अलग ही था। पर पीछे खड़ा व्यक्ति असली ताकत लग रहा था। कहानी में कई परतें हैं। हर किरदार अपनी जगह अहम है। ऐसे ड्रामा देखने की आदत पड़ गई है। रणभूमि की रानी ने उम्मीदों पर खरा उतरा। तनाव बनाए रखना आसान नहीं है। अंत बहुत रोमांचक था।

बच्ची और बंदूक

बच्ची के हाथ में रिवाल्वर देखकर हैरानी हुई। मासूमियत और हिंसा का यह मिश्रण अजीब था। पिता का प्यार और हथियार का डर साथ चल रहा था। रणभूमि की रानी ने बचपन के आघात को अच्छे से दिखाया। यह दृश्य लंबे समय तक याद रहेगा। बच्चों का अभिनय भी बहुत प्राकृतिक लगा। यह कहानी आगे क्या मोड़ लेगी। जानने की उत्सुकता बढ़ी।

तलवार की धार

अंत में तलवार चलते ही एक्शन शुरू हो गया। जो शांत लग रहा था, वह अचानक हिंसक हो गया। यह बदलाव बहुत तेज था। दर्शक को बोर होने का मौका नहीं मिलता। नेटशॉर्ट पर कंटेंट की गुणवत्ता बढ़ रही है। यह वीडियो उसका सबूत है। रणभूमि की रानी जैसे शो देखने का मजा अलग है। एडिटिंग बहुत तेज और सटीक है। समय अच्छा कटा।

अधूरी पहेली

पूरी कहानी एक पहेली लगती है। कौन दोस्त है कौन दुश्मन, पता नहीं चल रहा। हर फ्रेम में कुछ नया छिपा है। रणभूमि की रानी का हर एपिसोड उत्सुकता बढ़ाता है। कपड़ों से लेकर संवाद तक सब सटीक है। ऐसे ही और वीडियो चाहिए। समय बर्बाद नहीं होता। यह कहानी दिल से जुड़ती है। अगला भाग कब आएगा।