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गिरोह की आखिरी मालकिनवां1एपिसोड

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गिरोह की आखिरी मालकिन

नायिका अपने प्रेमी को बचाने के लिए जेल की गाड़ी लूट लेती है और काली जेल में ठूंस दी जाती है। वहाँ उसे एक रहस्यमयी विरासत मिलती है, और अपनी ताकत से सभी कैदियों को वश में कर लेती है। सब उसे 'गिरोह की मालकिन' कहकर बुलाने लगते हैं। जब वह जेल से बाहर निकलकर सागर नगर लौटती है, तो उसे पता चलता है कि उसका मंगेतर पहले ही शादी कर चुका है। गुस्से में वह उन सबको सबक सिखाती है जो उसे तुच्छ समझते थे। लोग उसे हल्के में लेते हैं, पर उन्हें नहीं पता कि उसका एक और रूप है – स्वतंत्र गिरोह की मालकिन।
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इस एपिसोड की समीक्षा

ललिता का जलवा

ललिता शर्मा की लड़ाई की कौशल देखकर दंग रह गए। जेल में सबको हरा दिया उसने। शुकल बुद्धा का रहस्यमयी अंदाज भी कमाल का है। गिरोह की आखिरी मालकिन में लड़ाई के दृश्य बहुत अच्छे हैं। कैदियों की भीड़ में वो अकेले भारी पड़ रही हैं। हर मुक्मे में ताकत दिखती है। ये शो देखने में बहुत रोमांचक लग रहा है। मुझे ये शैली बहुत पसंद आया।

रहस्यमयी बुद्धा

शुकल बुद्धा कौन हैं और जेल में क्यों हैं? ये सवाल दिमाग में चल रहा है। मोमबत्तियों की रोशनी में माहौल बहुत अलग लग रहा था। ललिता शर्मा कुछ गुप्त विद्या सीख रही हैं। गिरोह की आखिरी मालकिन की कहानी में गहराई है। तालिस्मान का चमकना बड़ा संकेत है। आगे क्या होगा ये जानने की उत्सुकता बढ़ गई है।

पुराना संबंध

तीन साल पहले का पुराना दृश्य बहुत जरूरी था। सूरज सिंह को ले जाते हुए दिखाया गया। ललिता शर्मा गाड़ी से सब देख रही थीं। दोनों के बीच कोई संबंध जरूर है। गिरोह की आखिरी मालकिन में कहानी के मोड़ अच्छे हैं। गाड़ियों का पीछा करने वाला दृश्य रोमांचक था। कहानी धीरे धीरे खुल रही है।

मजबूत किरदार

नारंगी कपड़ों में भी ललिता शर्मा बहुत मजबूत लग रही हैं। उनकी आंखों में दृढ़ संकल्प साफ दिखता है। बाकी कैदी उनसे डर रहे हैं। शुकल बुद्धा की मुस्कान में समझदारी है। अभिनय बहुत स्वाभाविक लगा। गिरोह की आखिरी मालकिन के किरदार यादगार हैं। हर किसी का अपना रंग है।

अनोखा माहौल

जेल के अंदर इतने दीये और मोमबत्तियां अजीब लग रहा था। मंदिर जैसा माहौल बना दिया है। ध्यान वाला दृश्य बहुत शांत था। गिरोह की आखिरी मालकिन का दृश्य शैली अनोखी है। ललिता शर्मा और शुकल बुद्धा की जोड़ी अच्छी लग रही है। धुआं और रोशनी का इस्तेमाल कमाल का है।

जादूई ताकत

शुकल बुद्धा ने वो तालिस्मान क्यों दिया? वो अचानक चमकने लगा। शायद उसमें कोई जादूई ताकत है। ललिता शर्मा अब किसी बड़ी चुनौती के लिए तैयार हैं। गिरोह की आखिरी मालकिन की कहानी तेज हो गई है। रहस्य बढ़ता जा रहा है। अंत वाला दृश्य बहुत प्रभावशाली था।

कैदियों का डर

बाकी कैदियों ने उसे परेशान करने की कोशिश की। लेकिन सब बेकार गया। सूरज सिंह पुराने दृश्य में उलझन में लग रहा था। सबकी नजरें ललिता शर्मा पर टिकी हैं। गिरोह की आखिरी मालकिन में सहायक कलाकार भी अच्छे हैं। जेल के सलाखों के पीछे का डर अच्छे से दिखाया।

तेज रफ्तार

दृश्य की रफ्तार बहुत सही है। लड़ाई से ध्यान तक का सफर सरल है। पुराने दृश्य का बदलाव अच्छा लगा। गिरोह की आखिरी मालकिन बिल्कुल बोर नहीं करता। हर पल में कुछ नया होता है। दर्शक बंधे रहते हैं। संपादन बहुत पेशेवर स्तर का है।

खूबसूरत नज़ारा

नारंगी कपड़े और सफेद पोशाक का अंतर बहुत अच्छा था। रोशनी नाटकीय है। चेहरे के भाव करीब से साफ दिखते हैं। ललिता शर्मा बहुत सुंदर लग रही हैं। गिरोह की आखिरी मालकिन की छायांकन शानदार है। हर चित्र को संवारकर बनाया गया है।

देखने लायक

ये कोई आम जेल की कहानी नहीं है। इसमें युद्ध कला और रहस्य है। शुकल बुद्धा जैसे मार्गदर्शक की जरूरत थी। गिरोह की आखिरी मालकिन देखने लायक कार्यक्रम है। कहानी में दम है। आगे के भाग का इंतजार रहेगा। ललिता शर्मा का किरदार बहुत ताकतवर है।