कैफे का दृश्य बहुत ही तीव्र था। दोनों दोस्तों के बीच का लगाव और बातचीत का तरीका बता रहा था कि कुछ गड़बड़ है। लड़की जो सफेद कपड़े में थी, वो चुपचाप कॉफी पी रही थी, लेकिन उसकी आँखें सब कुछ कह रही थीं। यह ठुकराकर पछताएगा जैसी स्थिति है जहाँ शब्द कम और नज़ारे ज्यादा बोल रहे हैं।
जब लड़के ने गुस्से या बेबसी में अपनी मुट्ठी भींची, उस पल ने पूरे दृश्य को बदल दिया। यह छोटी सी बारीकियां बताती हैं कि उसके अंदर कितना संघर्ष चल रहा है। बाहर से शांत लेकिन अंदर से टूटा हुआ। ठुकराकर पछताएगा की कहानी में ऐसे ही छोटे-छोटे इशारे बड़ी भूमिका निभाते हैं।
दूसरी लड़की की भूमिका बहुत अहम है। वो सिर्फ एक दोस्त नहीं, बल्कि एक सहारे की तरह खड़ी है। जब मुख्य किरदार टूट रही होती है, तो वो उसे संभालती है। यह दिखाता है कि रिश्ते सिर्फ प्रेम तक सीमित नहीं होते। ठुकराकर पछताएगा जैसे पलों में दोस्त ही सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
इस दृश्य में संवाद से ज्यादा आँखों का खेल दिलचस्प था। लड़के की नज़रें माफ़ी मांग रही थीं और लड़की की नज़रें दीवार बन गई थीं। बिना कुछ कहे इतना कुछ कह देना आसान नहीं होता। यह ठुकराकर पछताएगा वाले दृश्य की सबसे बड़ी ताकत है जो दर्शकों को बांधे रखती है।
लड़की का सफेद कपड़े पहनना और उसका व्यवहार एक अजीब विरोधाभास बना रहा है। सफेद रंग अक्सर मासूमियत का प्रतीक होता है, लेकिन यहाँ वो एक मजबूत और ठोस फैसले की निशानी लग रहा है। उसने अपने आप को एक कवच में ढाल लिया है। ठुकराकर पछताएगा की स्थिति में यह वेशभूषा बहुत मायने रखती है।