जब मौसम इतना बेरहम हो, तो इंसानियत भी ठिठुर जाती है। एक माँ और बेटी की मजबूरी को देखकर दिल पसीज जाता है, वहीं सामने खड़ी अमीर औरत की घमंडी हरकतें गुस्सा दिलाती हैं। बच्चे की मासूमियत और उस पर टूटती मुसीबतें दर्दनाक हैं। मेरे अनजान अरबपति पिता जैसे नाटक में अक्सर यही वर्ग अंतर दिखाया जाता है जो रोंगटे खड़े कर देता है। बिलों का ढेर और उदास चेहरा देखकर लगता है कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ।