शुरुआत में ही आलीशान कार का आगमन देखकर अंदाजा हो जाता है कि कहानी अमीराना ठाठ बाट वाली है। मुख्य पात्र के चेहरे पर गंभीरता साफ झलक रही है जो आगे चलकर कई राज खोलती है। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन जैसे नाटक में ऐसा क्लासिक अंदाज बहुत पसंद आता है। होटल के कर्मचारियों की घबराहट देखकर लगता है कि कोई बड़ा हादसा होने वाला है। सब कुछ बहुत ही रहस्यमयी तरीके से पेश किया गया है और दर्शक पूरा समय बंधे रहते हैं।
सुनहरे बालों वाली महिला के हाथ पर पट्टी देखकर ही समझ आ जाता है कि उसके साथ कुछ गड़बड़ हुई है। उसकी आंखों में डर और जिम्मेदारी दोनों साफ दिखाई दे रहे हैं। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन की कहानी में ऐसे पात्र बहुत महत्वपूर्ण साबित होते हैं। वह चुपचाप सब सह रही है लेकिन अंदर से टूटती हुई लग रही है। उसकी वर्दी और नाम पट्टिका से लगता है कि वह होटल में काम करती है और बहुत मजबूर है।
बूढ़ी महिला का अंदाज बहुत ही रईसों वाला है और वह अपने कुत्ते के साथ बहुत लाड़ करती हैं। उनका गुस्सा और हुकूमत चलाने का तरीका देखकर लगता है कि वह असली मालकिन हैं। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन में ऐसे विरोधी पात्र कहानी को आगे बढ़ाते हैं। कमरे में बिखरे खिलौने और खाने का कटोरा बताता है कि जानवर की देखभाल जरूरी है। दृश्य बहुत ही नाटकीय अंदाज में फिल्माया गया है जो बहुत पसंद आया।
कमरे नंबर दो सौ सैंतीस में जो हंगामा हुआ वह देखकर रोंगटे खड़े हो गए। एक महिला को जबरदस्ती बाहर खींचा जा रहा था और कोई उसकी मदद नहीं कर रहा था। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन जैसे कार्यक्रम में ऐसा ड्रामा आम बात है लेकिन दिल दहला देता है। पुरुष का व्यवहार बहुत ही क्रूर लग रहा था उस वक्त। सब लोग चुपचाप तमाशा देख रहे थे जो बहुत दुखद है और बिल्कुल गलत है।
जो महिला दीवार से सटकर बेहोश पड़ी थी उसकी हालत बहुत खराब लग रही थी। उसके कपड़े और चेहरे के भाव बता रहे हैं कि वह किसी मुसीबत में फंसी है। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन की पटकथा में ऐसे मोड़ दर्शकों को बांधे रखते हैं। क्यों कोई उसे वहां छोड़ गया यह जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है। धीमी गति से दिखाया गया दृश्य बहुत असरदार लगा और हमेशा याद रहेगा।
दो कर्मचारियों के बीच की खींचतान साफ दिखाई दे रही है पर्दे पर। एक तरफ दबंगई है तो दूसरी तरफ मजबूरी साफ नजर आ रही है। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन में सत्ता का संतुलन बहुत अच्छे से दिखाए गए हैं। नीली दुपट्टा वाली महिला की चुप्पी सब कुछ कह रही है। माहौल में तनाव इतना है कि सांस लेना भी मुश्किल लग रहा है और बहुत बुरा लगता है।
कुत्ते को लेकर जो झगड़ा हुआ वह बहुत ही अजीब लगा लेकिन कहानी का हिस्सा है। जानवर को बीच में लाना दर्शकों की सहानुभूति जुटाने का तरीका है। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन में जानवरों का इस्तेमाल भावनात्मक होता है। पट्टी बंधे हाथ वाली महिला ने जानवर को संभाला जो उसकी अच्छाई दिखाता है। यह दृश्य दिल को छू लेने वाला था और बहुत अच्छा लगा।
शहर की ऊंची इमारतों के बीच यह कहानी बहुत ही आधुनिक लगती है। काले कपड़े वाले व्यक्ति का चलने का ढंग बहुत ही भरोसेमंद और खतरनाक लग रहा था। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन का मंच सजावट बहुत ही शानदार बनाया गया है। हर दृश्य में एक अलग कहानी छिपी हुई है जो ध्यान खींचती है। रंगों का इस्तेमाल भी बहुत ही गहरा और प्रभावशाली है और बहुत सुंदर है।
अंत में जो मोड़ आया उसने सबकी उम्मीदें बदल कर रख दीं। लग रहा था कि सब ठीक है लेकिन असलियत कुछ और ही निकली। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन की कहानी में ऐसे उतार चढ़ाव बहुत जरूरी हैं। दर्शक हर पल यह सोचते हैं कि आगे क्या होने वाला है। रहस्य बनाए रखना इस नाटक की सबसे बड़ी ताकत है और बहुत जानदार है।
कुल मिलाकर यह लघु नाटक देखने लायक है और इसमें दम है। अभिनय और संवाद अदायगी बहुत ही स्वाभाविक और असली लग रही थी। बेटे की मंगेतर, माँ की दुश्मन को अगर पूरा देखें तो और मजा आएगा। इस मंच पर ऐसे सामग्री मिलना आज के समय में दुर्लभ है। मैं इसे अपने दोस्तों को जरूर सुझाव दूंगा और जरूर पसंद आएगा।