इस नाटक में पिता और बेटे का रिश्ता बहुत गहरा दिखाया गया है। बेटा अधिकारी बनकर आया है लेकिन पिता अभी भी मछली बेच रहे हैं। पिता की चिंता जायज है क्योंकि बड़े खानदान वाले घात में बैठे हैं। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में ऐसा लगाव कम ही देखने को मिलता है। पिता नहीं चाहते बेटा जोखिम ले। यह दृश्य बहुत भावनात्मक था।
महारानी छुपकर बाजार में आई हैं और मछली वाले को देख रही हैं। उनकी आंखों में कुछ अलग ही चमक है। क्या सच में वो इस साधारण व्यक्ति से शादी करना चाहती हैं। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ की कहानी में यह मोड़ बहुत रोचक लग रहा है। परिचारिका भी हैरान है कि मालकिन ऐसा क्यों कर रही हैं।
गंजे दोस्त का किरदार बहुत मजेदार है। वो बीच में आकर माहौल हल्का कर देता है। जब बेटा लाल कपड़ों में आया तो सबकी आंखें फटी रह गईं। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में हास्य और भावना का अच्छा मिश्रण है। मछली उछालने वाला दृश्य बहुत यादगार बना। दर्शक हंसते भी हैं और रोते भी हैं।
संवाद बहुत दमदार हैं। पिता कहते हैं कि अधिकारी मत बनो, वहां सांप छिपे होते हैं। बेटा कहता है मैं शहर रक्षा का सेनापति हूं। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में संवादों ने किरदारों की गहराई बढ़ा दी है। हर बात में एक नया मतलब छिपा हुआ है। भाषा बहुत सरल और प्रभावशाली है।
लग रहा था बेटा पिता को लेने आया है, लेकिन पिता ने मना कर दिया। फिर महारानी का प्रवेश होता है। सब कुछ बदल गया। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में कहानी बहुत तेजी से आगे बढ़ती है। दर्शक बस देखते ही रह जाते हैं कि आगे क्या होगा। कहानी में रुकावट नहीं आती।
लाल रंग की पोशाक में बेटा बहुत जच रहा है। वहीं महारानी के कपड़े बहुत नाजुक और सुंदर हैं। बाजार की सजावट भी असली लगती है। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में दृश्यों पर खासा ध्यान दिया गया है। हर झलक एक तस्वीर जैसा लगता है। रंगों का चुनाव बहुत सही किया गया है।
पिता की आंखों में बेटे के लिए चिंता साफ दिख रही थी। बेटा गर्व से भरा था लेकिन पिता की बात सुनकर चुप हो गया। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में भावनात्मक दृश्य दिल को छू लेते हैं। परिवार की इज्जत का सवाल सबसे बड़ा है। कोई समझौता नहीं करना चाहता।
महारानी क्यों आई हैं बाजार में। क्या वो सच में इस मछली वाले को जानती हैं। परिचारिका भी परेशान है। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में सस्पेंस बना हुआ है। हर कड़ी के बाद नया सवाल खड़ा हो जाता है। देखने वालों को अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है।
मछली वाले के कलाकार ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। गुस्सा और प्यार दोनों एक साथ दिखाया। बेटे का अभिनय भी थोड़ा नादान लगता है। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ में कलाकारों ने जान डाल दी है। छोटे दृश्यों में भी बड़ी बात कह दी गई है। प्रदर्शन सराहनीय है।
यह लघु नाटक बहुत मनोरंजक है। न बोरियत होती है न समझने में दिक्कत। कहानी सीधी है पर असरदार है। (डबिंग) जब महारानी बनी सौतेली माँ को देखकर समय का पता नहीं चलता। नेटशॉर्ट पर ऐसे ही अच्छी सामग्री मिलते रहने चाहिए। मनोरंजन की गारंटी है।