छत पर पहुंचकर कहानी में नया मोड़ आता है। मरीज की चीख और डॉक्टर का उसे पकड़ना भावनात्मक रूप से बहुत भारी है। गुलाब का बदला में यह दृश्य दिखाता है कि कैसे पागलपन और इंसानियत के बीच की लकीर मिट जाती है। अभिनय इतना असली लगा कि सांस रुक गई।
अचानक कमरे में घुसने वाले काले कपड़ों वाले लोग कहानी में नया रहस्य लाते हैं। उनकी चुप्पी और गंभीर चेहरे डरावने लगते हैं। गुलाब का बदला में यह मोड़ बताता है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। नेटशॉर्ट पर ऐसे ट्विस्ट देखना मजेदार है।
मरीज की आंखों में जो डर है, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। गुलाब का बदला में उसकी हर हरकत से लगता है कि वह किसी बड़ी साजिश का शिकार है। डॉक्टर का व्यवहार और भी संदिग्ध लगता है। ऐसे दृश्य दर्शक को बांधे रखते हैं।
सीसीटीवी कैमरे का शॉट कहानी में एक अलग ही डर पैदा करता है। लगता है कोई हमेशा देख रहा है। गुलाब का बदला में यह छोटा सा डिटेल्स बड़ा असर छोड़ता है। नेटशॉर्ट पर ऐसे साइकोलॉजिकल थ्रिलर देखना पसंद आता है।
डॉक्टर का व्यवहार शुरू में चिंतित लगता है, लेकिन बाद में खतरनाक हो जाता है। गुलाब का बदला में यह द्वंद्व बहुत अच्छे से दिखाया गया है। उसकी आवाज और हावभाव से लगता है कि वह कुछ छिपा रहा है। अभिनय शानदार है।