जब वह काले सूट में दरवाजे से अंदर आया, तो पूरा माहौल बदल गया। गुलाब का बदला में ऐसे मोड़ उम्मीद से परे हैं। उसने न सिर्फ पिंजरे को तोड़ा बल्कि उस लड़की को अपनी बाहों में समेट लिया। उसकी आंखों में गुस्सा और चेहरे पर चिंता, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई अपने खोए हुए प्यार को ढूंढ लाया हो।
पिंजरे के बाहर बैठे लोग पहले तो तालियां बजा रहे थे, लेकिन जैसे ही लड़की चिल्लाने लगी, उनके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था। गुलाब का बदला की यह कहानी हमें बताती है कि मनोरंजन की आड़ में कितनी क्रूरता छिपी हो सकती है। अंत में जब हीरो आता है, तो राहत की सांस लेते हैं।
उस लड़की की चमकदार लाल साड़ी और हाथों में भारी जंजीरें, यह दृश्य किसी बुरे सपने जैसा था। गुलाब का बदला में ऐसे विजुअल्स दिमाग से नहीं निकलते। वह कैसे संघर्ष कर रही थी, कैसे रो रही थी, हर पल दर्दनाक था। लेकिन अंत में उसकी मुस्कान ने सब दर्द धो दिया।
जब हीरो ने उस लड़की को पिंजरे से बाहर निकाला और अपने कोट में लपेट लिया, तो लगा जैसे कोई युद्ध जीत लिया हो। गुलाब का बदला का यह अंत बेहद भावुक था। वह लड़की अब सुरक्षित थी, और हीरो की बाहों में उसे सुकून मिला था। यह पल हमेशा याद रहेगा।
माइक वाले आदमी की हंसी और पिंजरे के अंदर मजाक उड़ाने वाले लोग, सबके सब विलेन लग रहे थे। लेकिन गुलाब का बदला में हीरो की एंट्री ने सबका समीकरण बदल दिया। उसने न सिर्फ लड़की को बचाया बल्कि उन विलेनों को भी सबक सिखाया। यह बदले की आग थी जो सब कुछ जला गई।