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लौटकर आया, तो बन गया अपराजेयवां18एपिसोड

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लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय

जिसे परिवार ने ठुकरा दिया था, वही नायक असल में एक अनमोल दिव्य शरीर वाला था। अठारह साल तक उसकी प्रतिभा छुपी रही, और उसने हर अपमान सहा। बस उसकी बचपन की साथी ने उसका साथ नहीं छोड़ा। दस साल के वादे के दिन, उसने एक अखाड़ा खड़ा किया, और उसी की प्रतीक्षा कर रही थी। नायक जब लौटा, तो देखा – उसकी प्रेमिका को जबरन शादी के लिए मजबूर किया जा रहा था, और उसका पुराना दुश्मन उसे सबके सामने अपमानित कर रहा था। यहीं से शुरू हुई उसकी असली पहचान और सबसे ऊपर उठने की कहानी।
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इस एपिसोड की समीक्षा

रात का वो मुकाबला

इस दृश्य में तनाव साफ़ झलकता है। नायक की आँखों में गुस्सा और चिंता दोनों हैं। वो महिला जिसके घूँघट पर खून के निशान हैं, उसकी चुप्पी सबसे ज्यादा शोर मचा रही है। काले कवच वाला व्यक्ति खुद को ताकतवर समझ रहा है, लेकिन कहानी का मोड़ कुछ और ही है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय देखकर लगा कि असली ताकत दिखाने में नहीं, सहने में है। नेटशॉर्ट ऐप पर गुणवत्ता बहुत अच्छी है।

सफेद पोशाक का राज़

सफेद कपड़ों वाली नायिका की हालत देखकर दिल दहल गया। उसके चेहरे पर पड़ा पर्दा और उस पर लाल धब्बा किसी बड़ी त्रासदी की कहानी कह रहा है। नायक उसे बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा रहा है। इस शो लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय में भावनाओं को बहुत गहराई से दिखाया गया है। रात के अंधेरे में मशाल की रोशनी और चेहरों के भाव लाजवाब हैं। बिल्कुल मिस न करें।

नायक का गुस्सा

जब नायक ने अपनी बात रखी, तो हवा में सन्नाटा छा गया। उसकी आवाज़ में ठहराव था लेकिन आँखों में आग थी। सामने खड़े विरोधी को लगा कि वो जीत गया है, पर असली खेल तो अब शुरू हुआ है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय की कहानी में हर किरदार की अपनी अहमियत है। नेटशॉर्ट ऐप पर ऐसे सीन देखना सुकून देता है। अभिनय बहुत स्वाभाविक लगा।

अंधेरी रात का सच

आंगन की मंच सज्जा और रात का माहौल किसी पुरानी दास्तान को याद दिलाता है। जमीन पर पड़े हथियार बता रहे हैं कि पहले ही कुछ हो चुका है। सब लोग एक व्यक्ति के इर्द गिर्द खड़े हैं जो शायद नेता है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय में ऐसे सीन बार बार देखने को मिलते हैं। रोशनी और छाया का खेल कमाल का है। दर्शक को बांधे रखने के लिए यह काफी है।

बिना बोले बातें

कई बार संवाद से ज्यादा चेहरे के हाव भाव कहानी बताते हैं। यहाँ भी वही हो रहा है। कवच वाले व्यक्ति की मुस्कान में छल है और नायक के चेहरे पर जिम्मेदारी। वो महिला बीच में खड़ी सब कुछ सुन रही है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय की पटकथा बहुत मजबूत है। नेटशॉर्ट ऐप का उपयोग भी आसान है। हर कड़ी के बाद अगला देखने का मन करता है।

टकराव की घड़ी

दो गुटों के बीच की दूरी सिर्फ कदमों की नहीं, विचारों की भी है। एक तरफ ताकत का घमंड है तो दूसरी तरफ सच्चाई का साथ। नायक अकेला खड़ा है लेकिन उसका हौसला टूटा नहीं है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय में संघर्ष को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। रात के दृश्य में ठंडक है लेकिन गर्माहट बहस में है। बहुत ही शानदार प्रस्तुति है।

पोशाक और शख्सियत

हर किरदार के कपड़े उसकी पहचान बता रहे हैं। काले कवच वाला सख्त मिजाज लग रहा है तो सफेद पोशाक वाली नाजुक। नायक के कपड़े सादे लेकिन प्रभावशाली हैं। इन बारीकियों पर ध्यान देना जरूरी है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय में पोशाक पर खासा ध्यान दिया गया है। नेटशॉर्ट ऐप पर चित्र की स्पष्टता भी साफ़ है। बारीकियों को पकड़ना आसान है।

आँखों में नमी

नायिका की आँखों में आँसू थे लेकिन वो रो नहीं रही थी। यह सबूत है कि वो कितनी मजबूत है। नायक उसे देख रहा है जैसे वो उसकी दुनिया हो। इस पल को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय में प्रेम और नाटक का अच्छा मिश्रण है। नेटशॉर्ट ऐप पर वक्त बिताना अच्छा लगता है। ऐसे सीन दिल को छू जाते हैं।

कुछ होने वाला है

यह शांति तूफान से पहले की है। सब लोग इंतज़ार कर रहे हैं कि अगला कदम कौन उठाएगा। जमीन पर पड़े हथियार गवाह हैं कि लड़ाई हो चुकी है या होने वाली है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय की कहानी में रहस्य बना रहता है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह कहना मुश्किल है। नेटशॉर्ट ऐप पर नई कड़ी का इंतज़ार रहेगा।

एक बेहतरीन सफर

इस कार्यक्रम को देखते हुए समय का पता नहीं चलता। हर सीन में कुछ नया है। किरदारों का मेलजोल बहुत अच्छा है। नायक और खलनायक के बीच की दुश्मनी असली लगती है। लौटकर आया, तो बन गया अपराजेय ने उम्मीदों पर खरा उतरा है। नेटशॉर्ट ऐप की वजह से ऐसे कार्यक्रम आसानी से मिल जाते हैं। रात के वक्त देखने का मज़ा ही अलग है। सबको देखना चाहिए।