जब वो घुटनों पर गिरा, तो लगा जैसे कोई राज खुल गया हो। उसकी आँखों में अपराधबोध था, या शायद पछतावा। नकली मौत, सच्ची ज़िंदगी में ऐसे मोड़ ही तो कहानी को नया रंग देते हैं। वो क्यों गिरा? क्या वो दोषी था?
उसकी आवाज़ में इतना क्रोध था कि दीवारें काँप उठीं। उसने उंगली उठाई, तो लगा जैसे कोई फैसला सुना दिया हो। नकली मौत, सच्ची ज़िंदगी में ऐसे पल ही तो देखने को मिलते हैं जो रोंगटे खड़े कर दें। वो कौन था? राजा या न्यायाधीश?
वो बस खड़ा था, आँखें नीची किए। पर उसकी चुप्पी में इतना कुछ था कि लग रहा था जैसे वो सब जानता हो। नकली मौत, सच्ची ज़िंदगी में ऐसे किरदार ही तो कहानी को गहराई देते हैं। वो क्या जानता था? क्यों चुप था?
उसकी आँखों में आश्चर्य था, शायद डर भी। वो बस देख रहा था, जैसे कुछ समझ नहीं पा रहा हो। नकली मौत, सच्ची ज़िंदगी में ऐसे पल ही तो देखने को मिलते हैं जो दिल को छू जाएं। वो क्या सोच रहा था? क्या वो भी फंस गया था?
लकड़ी की दीवारें, लाल कालीन, और बीच में खड़े लोग। सब कुछ इतना शांत था, पर हवा में तनाव था। नकली मौत, सच्ची ज़िंदगी में ऐसे सेट ही तो कहानी को जीवंत बनाते हैं। लग रहा था जैसे कोई बड़ा फैसला होने वाला हो।