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(डबिंग) बहको, कार धोने वाले चाचावां30एपिसोड

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(डबिंग) बहको, कार धोने वाले चाचा

पाँच साल पहले रेसिंग छोड़ चुका करण सिंह आज रामगढ़ कस्बे में एक मैकेनिक बनकर छिपा है। लेकिन जब रैप्टर रेसर्स गाँव वालों को चुनौती देते हैं और पूरे कस्बे का भविष्य दांव पर लग जाता है, तो करण के सामने सवाल है—चुप रहे या आखिरी बार रेस ट्रैक पर उतरे। क्या यह पूर्व चैंपियन अपने अतीत को पछाड़ पाएगा और अपने लोगों को बचा पाएगा?
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इस एपिसोड की समीक्षा

कबीर की उलझन और रहस्य

कबीर की उलझन देखकर लगता है कि वह वाकई कुछ भूल गया है। कमरे में तनाव इतना है कि सांस लेना मुश्किल हो रहा है। सफेद शर्ट वाली लड़की की बातों में एक अजीब सा भरोसा है। ऐसा लग रहा है जैसे यह कहानी किसी बड़े रहस्य की ओर बढ़ रही है। मुझे यह नाटक डबिंग बहको जैसा लग रहा है जहां पहचान का खेल चलता है। कबीर सिंह बनने का दावा करना साहस का काम है।

क्लब का शानदार दृश्य

अर्जुन मल्होत्रा के क्लब का दृश्य बहुत ही शानदार था। जब सुरक्षा रक्षक ने उन्हें रोका, तो लगा कि अब क्या होगा। कबीर कुमार का नाम सुनकर सबकी सांसें रुक गईं। यह मोड़ बिल्कुल वैसा ही था जैसे कार धोने वाले चाचा में आता है जब हीरो प्रवेश करता है। सबके चेहरे के भाव देखने लायक थे। रहस्य बना हुआ है कि अर्जुन मिलेगा या नहीं।

सूट वाले का अंदाज

सूट वाले आदमी का अंदाज बहुत गजब का था। वह खुद को कबीर सिंह बता रहा है, पर असलियत कुछ और लग रही है। कमरे में बैठे लोग हैरान हैं कि आखिर चल क्या रहा है। यह उलझन दर्शकों को भी बांधे रखती है। नेटशॉर्ट पर ऐसे नाटक देखना बहुत मजेदार होता है। कहानी में एक अलग ही जान है।

कपल का प्यारा दृश्य

लड़के और लड़की का जोड़ा वाला दृश्य बहुत प्यारा था। वे दोनों एक साथ बैठे हैं और सब देख रहे हैं। उनकी आंखों में सवाल हैं कि यह सब क्यों हो रहा है। कबीर का दर्द देखकर बुरा लग रहा था। वह छाती पकड़कर बैठ गया था। यह भावनात्मक नाटक है या संघर्ष, समझ नहीं आ रहा। पर मजा आ रहा है।

फिल्मी अंदाज और बैठक

क्लब के अंदर जाने का दृश्य बहुत ही फिल्मी था। सब लोग एक लाइन में चल रहे थे। फर्श चमक रहा था और माहौल बहुत गंभीर था। ऐसा लग रहा था कि कोई बड़ी बैठक होने वाली है। मुझे यह दृश्य डबिंग बहको की याद दिलाता है जहां हीरो खलनायक के पास जाता है। कबीर की हिम्मत देखकर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है।

रक्षक का पेशेवर अंदाज

सुरक्षा रक्षक की वर्दी और उसका अंदाज बहुत पेशेवर था। उसने हाथ उठाकर उन्हें रोका। यह छोटा सा कार्यवाही दृश्य में बहुत वजन डालता है। कबीर कुमार का नाम लेते ही माहौल बदल गया। यह नाटक कार धोने वाले चाचा से भी ज्यादा दिलचस्प लग रहा है। हर किरदार अपनी जगह सही है।

भूरे कोट वाला शक

भूरे कोट वाले आदमी ने जब कहा कि क्लब का पता सबको है, तो लगा कि वह सब जानता है। पर क्या वह सच बोल रहा है? यह शक बना रहना चाहिए। कहानी में मोड़ की कमी नहीं है। कबीर का चेहरा देखकर लगता है कि वह कुछ छुपा रहा है। यह तनाव बहुत अच्छा है।

अर्जुन का ताकतवर नाम

अर्जुन मल्होत्रा का नाम जैसे ही लिया गया, सब चुप हो गए। यह नाम इस दुनिया में बहुत ताकतवर लग रहा है। कबीर को उससे मिलना है, पर क्यों? यह सवाल दिमाग में घूम रहा है। नाटक की रफ्तार बहुत तेज है। एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने का तरीका बहुत सहज है। देखने में बहुत मजा आता है।

लड़की का शानदार रूप

चमड़े का कोट पहनी लड़की का रूप बहुत शानदार था। उसने कहा कि ज्यादा उम्मीद मत रखो। यह संवाद बहुत गहरा था। शायद वह जानती है कि अर्जुन कितना खतरनाक है। कबीर की जिद देखकर लगता है कि वह रुकने वाला नहीं है। यह कहानी डबिंग बहको जैसी ही रोमांचक है। हर पल कुछ नया होता है।

कबीर कुमार का बड़ा मोड़

आखिर में कबीर कुमार का नाम लेना सबसे बड़ा मोड़ था। पहले वह कबीर सिंह बनने की बात कर रहा था। अब असली नाम सामने आया है। यह धोखा क्यों? शायद कोई बड़ी योजना है। यह नाटक कार धोने वाले चाचा से बिल्कुल अलग है। मुझे यह अंदाज बहुत पसंद आया। नेटशॉर्ट पर ऐसी कहानी की उम्मीद थी।