अस्पताल का वो सीन जहां मां अपनी चोटों को भूलकर बेटी के पास बैठी है, दिल को छू लेता है। डॉक्टर के जाने के बाद उसका रोना और बेटी को सहलाना दिखाता है कि न्याय सिर्फ कानून नहीं, रिश्तों में भी होता है। उसकी आंखों में बेटी के लिए चिंता साफ झलकती है।
लाल बालों वाली लड़की का व्यवहार देखकर गुस्सा आता है। कैसे वो मजे ले रही थी जबकि सामने कोई तड़प रहा था। न्याय में ऐसे विलेन्स की सजा जरूरी है। वो फोन कॉल और फिर अस्पताल का सीन बताता है कि बुराई का अंत अच्छा नहीं होता। सबक मिलना चाहिए ऐसे लोगों को।
अंत में मां का वो एक्शन चौंकाने वाला था। बेटी के गले से चेन उतारना और उसे फेंक देना। क्या ये न्याय था या गुस्सा? शायद उसे लगा ये गहना अब उसकी बेटी के लिए श्राप बन गया है। उसकी आंखों में आंसू और चेहरे पर गुस्सा सब कुछ बता रहा था।
डाइनर के शोर के बाद अस्पताल का सन्नाटा बहुत भारी लग रहा था। मां और बेटी दोनों के सिर पर पट्टियां, चेहरे पर चोटें। न्याय की राह में ये चोटें निशानी हैं। डॉक्टर का आना और जाना, फिर मां का फोन करना, सब कुछ बहुत रियल लगा।
बेटी का रोना और मां को देखकर मुस्कुराने की कोशिश करना दिल तोड़ देता है। उसे पता है कि मां उसके लिए क्या झेल रही है। न्याय में ऐसे मासूम चेहरे हमेशा याद रहते हैं। उसकी आंखों में डर और उम्मीद दोनों थे।